जब मार्कोस आखिरकार होटल पहुंचा तो ग्यारह बज चुके थे। उसकी उड़ान दो घंटे देर से उतरी थी और टैक्सी वाले ने शहर का लंबा रास्ता लिया था। उसने अपना सूटकेस लॉबी के फर्श पर रखा और काउंटर के पीछे खड़ी महिला को देखा।
"मार्कोस सोतो के नाम से आरक्षण है," उसने कहा। उसने यह वाक्य हवाई जहाज में अभ्यास किया था। महिला ने कुछ देर टाइप किया, फिर एक अजीब सा चेहरा बनाया जिसे वह समझ नहीं सका।
"मुझे खुशी है," उसने कहा। "आपका कमरा अब उपलब्ध नहीं है। हमारे बुकिंग सिस्टम में कोई समस्या थी। लेकिन हमारे पास तीसरी मंजिल पर एक कमरा बचा है।" वह रुकी। "इसमें बालकनी है। वही कीमत।"
Read it. Then say it.
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मार्कोस ने बिना बहस किए चाबी ले ली। लिफ्ट उससे भी पुरानी थी। ऊपर जाते समय वह कराह रही थी। जब उसने 304 का दरवाजा खोला और पर्दे हटाए, तो पूरा शहर उसके नीचे फैला था — छतें, जगमगाती खिड़कियां, एक छोटा चौक जिसमें फव्वारा अभी भी चल रहा था।
वह अपने कोट में बालकनी पर निकला और दो लोगों को फव्वारे के पास सिगरेट साझा करते देखा। हवा ठंडी थी। वह काफी देर तक वहीं खड़ा रहा।