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पॉली और लाइब्रेरी का रास्ता

Twenty minutes of proud wandering, one patient owl, and the discovery that a single question is worth more than a whole map.

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पॉली और लाइब्रेरी का रास्ता

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पॉली का एक सिद्धांत था कि नक़्शे सैलानियों के लिए होते हैं, और यह सिद्धांत ठीक बीस मिनट चला। मोहल्ले की गलियाँ ऐसे मुड़ती थीं जैसे किसी ने उन्हें हाथ से खींचा हो, हर मोड़ पर उसी बेकरी की ख़ुशबू थी, और लाइब्रेरी थी कि सामने आने को तैयार ही नहीं। एक कोने पर मुड़ा हुआ अख़बार लिए एक उल्लू खड़ा था, खड़े-खड़े पढ़ता हुआ, जैसे सिर्फ़ उल्लू ही पढ़ सकते हैं। “सुनिए, एक बात पूछनी है। लगता है मुझे रास्ता नहीं मिल रहा।”

उल्लू ने बहुत धैर्य से अख़बार नीचे किया। “लाइब्रेरी कहाँ है? कब से यहीं चक्कर लग रहे हैं।” दूर नहीं है, उल्लू ने समझा...

उल्लू ने बहुत धैर्य से अख़बार नीचे किया। “लाइब्रेरी कहाँ है? कब से यहीं चक्कर लग रहे हैं।” दूर नहीं है, उल्लू ने समझाया, असली मुसीबत फ़व्वारा है। हर कोई फ़व्वारे पर ग़लत तरफ़ मुड़ जाता है। “फ़व्वारे पर दाएँ मुड़ना है या बाएँ?” बाएँ, हमेशा बाएँ, और उसके बाद चौक तक बस सीधी गली। “चौक तक सीधे, ठीक है! यह तो आसान लगता है।”

और सचमुच आसान था, बस किसी ने ज़ोर से कह भर दिया था। लाइब्रेरी चौक के पीछे आ गई, अपनी चौड़ी सीढ़ियों और खुले दरवाज़ों ...

और सचमुच आसान था, बस किसी ने ज़ोर से कह भर दिया था। लाइब्रेरी चौक के पीछे आ गई, अपनी चौड़ी सीढ़ियों और खुले दरवाज़ों के साथ, ठीक वहीं जहाँ वह हमेशा से थी। “बहुत-बहुत धन्यवाद! आपने मेरी दोपहर बचा ली।” उल्लू ने अगली पंक्ति से नज़र हटाए बिना अख़बार हिला दिया। उन चौड़ी सीढ़ियों पर एक नए सिद्धांत के साथ क़दम पड़े: दो बिंदुओं के बीच सबसे छोटा रास्ता एक अच्छा सवाल है।

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